भारतीय इतिहास का अर्थ एवं उद्देश्य | भारत का प्राचीन काल मे नाम । भारतीय इतिहास जानने के साधन । वेद। उपनिषद । पुराण । ई०पू० एवं ई० में अंतर । ऋग्वेद । यजुर्वेद । अथर्ववेद । सामवेद । विदेशी लेखक एवं यात्री।bharatiy itihas ka arth uddeshy | bharat ka prachin kal me naam | bhartiy itihas janne ke sadhan , ved , upanishad,puraan, rgved,yajurved, atharvaved,saamaved | videshi lekhak | AD | BC|

 भारतीय इतिहास :-

भारतीय इतिहास को कुल तीन भागों में बांटा गया है।

1.प्राचीन भारत का इतिहास 
2.मध्यकालीन भारत का इतिहास 
3.आधुनिक भारत का इतिहास


सबसे पहले इतिहास को तीन भागों में बांटने का श्रेय जर्मन इतिहासकार क्रिस्टोफ सेलिरियस को जाता है।

भारतीय इतिहास का अर्थ एवं उद्देश्य :-

इतिहास का अर्थ है "ऐसा निश्चित रूप से हुआ है"
इस प्रकार इतिहास अतीत एवं बीती हुई घटनाओं को जानने का साधन है।
किसी देश के इतिहास का अध्ययन करके हम उस देश के अतीत एवं बीती हुई घटनाओं के बारे में जान सकते हैं।
यहा अतीत का तात्पर्य सभ्यता एवं संस्कृति से है।

भारत का प्राचीन काल में निम्न नाम थे :-

● भारत वर्ष
● इण्डिया
● हिन्दुस्तान
● आर्यावर्त
 
भारतवर्ष :- यह नाम भरत या आर्यों के नाम पर पड़ा।
आर्यों में कुल पाँच वंश थे। इन्ही पाँच वंशो में भरत एक वंश था।
आर्य लोग मध्य एशिया के मूल निवासी थे। आर्य मध्य एशिया से भारत के सप्त सैंधव प्रदेश या सात नदियों वाले प्रदेश पंजाब में आकर बस गए थे। पंजाब की वो सात नदिया  सिंधु, सरस्वती, सतलज, व्यास, रावी, झेलम, चेनाब है।

भारत को सात पवित्र नदियों वाला देश कहां जाता है
ये नदियां गंगा,यमुना, सरस्वती,सिंधु,नर्मदा, गोदावरी, कावेरी है।

इण्डिया :- यूनानीयों ने भारत को इंडिया का नाम दिया।

हिन्दुस्तान :- मध्यकालीन लेखकों तथा इतिहासकारों ने हिंद पर्वत के नाम पर भारत को हिंदुस्तान नाम दिया।

आर्यावर्त :- आर्यों के नाम पर देश का नाम आर्यावर्त पड़ा।

भारतीय इतिहास जानने के साधन :- 

वेद 
उपनिषद 
महाभारत 
रामायण 
पुराण 
जैन एवं बौद्ध धर्म 
विदेशी लेखक एवं यात्री 
पुरातत्व संबंधित साक्ष्य

वेद :- 
वेद की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई थी।
कुल चार वेद हैं।
ऋग्वेद 
यजुर्वेद 
सामवेद 
अथर्ववेद
चारों वेदों को संहिता कहा जता है।


ऋग्वेद :-

ऋग्वेद की रचना 1500 से 1000 ईसा पूर्व हुए थी।
मंत्रों के द्वारा देवताओं का आवाहन ऋग्वेद में किया गया है।
ऋग्वेद में 10 मंडल(अध्याय) तथा 1028 सूक्त  है।
जिसमे 11 हजार मंत्र (10580) हैं।
दूसरा और सातवां अध्याय सबसे पहले तथा पहला और दसवां अध्याय सबसे बाद में जोड़ा गया।
ऋग्वेद में जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की जानकारी मिलती है।
ऋग्वेद पद्यात्मक है।
विश्वामित्र द्वारा रचित ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता सावित्री को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है।
चार वर्ण( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) समाज की कल्पना का स्रोत ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्णित पुरुष सूक्त है। 
ऋग्वेद में प्रयुक्त अधन्य शब्द का संबंध गाय से है।
ऋग्वेद में इंद्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं की रचना की गई है।
प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है।

ईसा पूर्व तथा ईस्वी में अंतर

ईसा मसीह के जन्म के पहले के समय को ईसा पूर्व तथा ईसा मसीह के जन्म के बाद के समय को ईस्वी के नाम से जाना जाता है।
ई०पू० (-) घटते क्रम में।
ई०(+) बढ़ते क्रम में।

यजुर्वेद :- 

यज्ञ के नियमों और विधानों का उल्लेख यजुर्वेद में है।
यजुर्वेद गद्य और पद्य दोनों में है।

सामवेद :- 

साम का अर्थ गान होता है।
यज्ञ के अवसर पर मंत्रों के संग्रह को गाया जाता है।
इसलिए सामवेद को भारतीय संगीत का मूल कहा जाता है।


अथर्ववेद :-

अथर्ववेद में जादू टोने, टोटके, औषधियों का उल्लेख है।

उपनिषद :-

उपनिषद का अर्थ "गुरु के समीप बैठकर रहस्यमय बातों को जानना"।
उपनिषद में दर्शनशास्त्र का उल्लेख है। दर्शनशास्त्र में आत्मा, परमात्मा तथा संसार का उल्लेख है।
कुल उपनिषद 108 है।
भारत का आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद  से लिया गया है।

महाभारत :- 

महाभारत की रचना पांचवी सदी ईसा पूर्व में महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई थी।
महाभारत के प्राचीन नाम क्रमशः 
जयसंहिता (8800 श्लोक)
भारत (2400 श्लोक)
महाभारत (वर्तमान में एक लाख श्लोक)

रामायण :-

रामायण की रचना 4वी सदी ईसा पूर्व में महर्षि वल्मीकि द्वारा की गई थी।
रामायण में श्लोकों की संख्या क्रमशः 6000,12000 और वर्तमान में कुल 24000 श्लोक है।

पुराण :-

पुराण की रचना की तीसरी सदी ईसा पूर्व में महर्षि लोमहर्ष और उनके पुत्र उग्रश्रवा द्वारा की गई थी।
पुराणों की संख्या 18 है सबसे प्राचीन पुराण मत्स्य पुराण है। जिनमें से केवल पाँच मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्राह्मण एवं भागवत में ही राजाओं की वंशावली पाई जाती है।


जैन ग्रन्थ :-(प्राकृत भाषा)

●आचारांगसूत्र
●भद्रबाहु चरित्र 
●परिशिष्ट वर्मन
इन जैन ग्रंथों की रचना 6वी सदी ईसा पूर्व में गुजरात के बल्लभी नामक स्थान पर प्राकृत भाषा मे (उ० बिहार की क्षेत्रीय भाषा) में हुई थी।
जैन ग्रंथों से महावीर स्वामी के जीवन और कार्यों  के बारे में
जानकारी मिलती है।
Note :- पाली भाषा दक्षिणी बिहार की क्षेत्रीय भाषा है।

बौद्ध ग्रंथ :-(पालि)


जातक :- बुद्ध के पूर्व जन्मों का उल्लेख है

त्रिपिटक :-
त्रिपिटक का अर्थ तीन पिटारियो या बक्से से है।
इन तीनों पिटारियो में गौतम बुध का उपदेश संग्रहित है
विनय पिटक :- बुद्ध का नैतिकता से संबंधित उपदेश संग्रहित है।
सुत्त पिटक :- बुद्ध का धार्मिक उपदेश संग्रहित है।
अभिधम्म पिटक :- बुद्ध का दार्शनिक उपदेश संग्रहित है।


विदेशी लेखक एवं यात्री :- 


हेरोडोटस :-

हेरोडोटस यूनान का निवासी था इसे इतिहास का पिता या जनक भी कहा जाता है।
हिस्टोरिका इसकी प्रसिद्ध पुस्तक है।
हिस्टोरिका से हमें भारत और अरब देशों के बीच संबंधों की जानकारी मिलती है।

मेगस्थनीज :- 

यूनानी यात्री मेगस्थनीज यूनान के राजा सेल्यूकस निकेटर का दूत बनकर भारत में चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया और इंडिका नामक पुस्तक लिखी। इंडिका से हमें भारतीय  समाज एवं संस्कृति का ज्ञान होता है।

फाह्यान :-

चीनी यात्री फाह्यान भारत में चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आया था और मध्य प्रदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया था

ह्वेनसांग :- 

चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत में हर्षवर्धन के दरबार में 629 ई० में आया और 645 ई० तक रहा यानी 16वर्षों तक वह भारत मे रहा और यात्रा वेतांत लिखी।
उसने अपने पुस्तक सी०यू०की० में अपनी यात्रा तथा तत्कालीन भारत का विवरण दिया।

अलबरूनी :-

अरबी यात्री अलबरूनी महमूद गजनवी के साथ भारत आया और प्रसिद्ध पुस्तक किताबुल ए हिंद अथवा तहकीके ए हिंद लिखी।

पुरातत्व संबंधित साक्ष्य :-

अभिलेख संबंधित साक्ष्य
मुद्रा संबंधित साक्ष्य 
स्मारक संबंधित साक्ष्य

भारतीय पुरातत्वशास्त्र का पितामह एलेग्जेंडर कनिंघम को कहा जाता है।
सर्वप्रथम भारतवर्ष का जिक्र हाथी गुफा अभिलेख में है।
उत्तर भारत के मंदिरों की कला की शैली नागर शैली एवं दक्षिण भारत के मंदिरों की कला द्रविड़ शैली कहलाती है।
दक्षिणापथ के मंदिरों के निर्माण में नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का प्रभाव पड़ा। अतः यह बेसर शैली का कहलाता है।




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