हड़प्पा सभ्यता या सिंधु सभ्यता | hadappa sabhyata | sindhu sabhyata

 हड़प्पा सभ्यता या सिंधु सभ्यता :-

(2500 ई०पू० से 1750 ई० पू०)
1921 एवं 1922 में पुरातत्व शास्त्री दयाराम साहनी तथा रखालदास बनर्जी द्वारा प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध हो गया कि हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में 483km की दूरी होने के बावजूद भी यह दोनों सभ्यताएं एक समय में एक ही सभ्यता के दो केंद्र थे।
इसलिए पिगट महोदय ने इन दोनों सभ्यताओं को जुड़वा राजधानी की संज्ञा दी।

हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त छह स्थानों को नगर की संज्ञा दी गई।

    नगर                वर्ष      स्थान          खोजकर्ता
● हड़प्पा          (1921, पाकिस्तान, दयाराम साहनी)
● मोहनजोदड़ो (1922, पाकिस्तान, रखाल दास बनर्जी)
● चन्हूदडो      (1931,   पाकिस्तान, गोपाल मजूमदार)
● कालीबंगा    (1951,   राजस्थान, ब्रजवासी लाल एवं अमलानंद घोष)
● लोथल        (1954,  गुजरात, रंगनाथ राव)
● बनवाली     (1974,  हरियाणा, रविंद्र सिंह विष्ट)


हड़प्पा :-

हड़प्पा सभ्यता को कांस्य युगीन सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
हड़प्पा पंजाब के मांटगोमरी जिले के रावी नदी के किनारे बाएं तट पर वर्तमान में शाहीवाल जिला पाकिस्तान में स्थित है।
खोजकर्ता :- 1921 में दयाराम साहनी द्वारा
प्राप्त सामाग्री :- अन्नागार (अन्य रखने का स्थान)
                       कब्रिस्तान (R-37 के नाम से जाना जाता है)

मोहनजोदड़ो :-

अर्थ :- मृतकों या प्रेतों का टीला
पाकिस्तान की लरकाना जिले के सिंध नदी के दाहिने तट पर स्थित है।
खोजकर्ता :- 1922 में रखाल दास बनर्जी द्वारा
प्राप्त सामाग्री :-
स्नानागार 
नर्तक की प्रतिमा ( कांसे )
भगवान शिव की विशाल पत्थर की प्रतिमा 
सभाभवन

सिंधु काल में विदेशी व्यापार :-

आयातित वस्तुएं             प्रदेश
ताँबा                  खेतड़ी(राजस्थान), बलूचिस्तान, ओमान
चाँदी                  अफगानिस्तान, ईरान
सोना                  कर्नाटक, अफगानिस्तान, ईरान
टिन                    अफगानिस्तान, ईरान
सीसा                  ईरान,राजस्थान,अफगानिस्तान
गोमेद                  सौराष्ट्र
लाजवर्त               मेसोपोटामिया
सेलखड़ी              बलूचिस्तान (पाक.)
जम्बुमणि              महाराष्ट्र
शिलाजीत              हिमालय क्षेत्र से
संगमरमर                राजस्थान 
फिरोजा, जेड           मध्य एशिया (ईरान)

Note :- 
ताँबा + टिन = काँसा

चन्हूदडो :-

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सिंधु नदी के किनारे
खोजकर्ता :- 1931 गोपाल मजूमदार
प्राप्त सामग्री :- 
मनके का कारखाना
लिपस्टिक, काजल,कंघा,उस्तरा।

कालीबंगा :-

अर्थ :- काले रंग की चूड़ियां।
राजस्थान के गंगानगर जिले के घग्घर नदी के किनारे स्थित है।
खोजकर्ता :- 1951 ब्रजवासी लाल एवं अमलानंद घोष
प्राप्त सामाग्री :- 
काले रंग की चूड़ियां
हवन कुंड ( यज्ञ स्थल)
जुते हुए खेत का साक्ष्य

लोथल :- ( लघु हड़प्पा, लघु मोहनजोदड़ो)

गुजरात के अहमदाबाद जिले के भोगवा नदी के किनारे स्थित है।
खोजकर्ता :- 1954 रंगनाथराव
प्राप्त सामग्री :-
धान या चावल का साक्ष्य
तीन युगल समाधिया
बंदरगाह या गोदीबाड़ा

रोपण :- 

सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित है।
आजादी के बाद भारत में खोजा जाने वाला प्रथम हड़प्पाई पुरास्थल।

खोजकर्ता :- 1953 यज्ञदत्त शर्मा ।

अवस्थिति :- भारत के पंजाब प्रांत के रूपनगर जिले में सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित।

प्राप्त सामग्री :- एक कब्र में मालिक के शव के साथ कुत्ते को भी दफनाया गया। ऐसा ही साक्ष्य कश्मीर के बुर्जहोम में नवपाषाण काल की बस्ती से मिला था।
कुल्हाड़ी के साक्ष्य, गड्ढों वाले घर( गर्तावास) के साक्ष्य,

सुरकोतड़ा :- 


खोजकर्ता :- 1964 में जगपति जोशी 

अवस्थिति :- गुजरात राज्य के  कच्छ क्षेत्र में।

प्राप्त सामग्री :- हड़प्पा सभ्यता के पतन के अवशेष के साक्ष्य, हड़प्पा से विदेशी व्यापार के साक्ष्य,घोड़े के हड्डी के साक्ष्य, तराजू के पलड़ा के साक्ष्य, कब्र को पत्थर से ढकने के साक्ष्य।

धौलावीरा :-

भारत में हड़प्पा का दूसरा सबसे बड़ा स्थल धौलावीरा है।

खोजकर्ता :- 1990-1991 रवींद्र सिंह बिष्ट

अवस्थिति :- गुजरात के कच्छ क्षेत्र में भचाऊ तालुके में स्थित।
प्राप्त सामग्री :- हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के दस चिन्हो वाला एक शिलालेख, शहर का त्रिकोणीय विभाजन,
धौलावीरा का नगर तीन भाग में विभक्त है- किला, मध्य नगर,निचला नगर।
धौलावीरा से एक लंबे जलाशय के साक्ष्य।

सुतकांगेन्डोरे :- 


खोजकर्ता :- 1927 में आरेल स्टाइन 

अवस्थिति :- दाश्क नदी के किनारे (ब्लूचिस्तान, पाकिस्तान)

प्राप्त सामग्री :- बंदरगाह के साक्ष्य, ताँबे की कुल्हाड़ी के साक्ष्य, बेबीलोन से व्यापारिक संबंध के साक्ष्य, मानव भस्म रखा एक बर्तन के साक्ष्य।

आलमगीरपुर :- ( मेरठ,उ.प्र.)


हड़प्पा का सर्वाधिक पूर्वी पूरास्थल।

खोजकर्ता :- 1958 यज्ञदत्त शर्मा 

अवस्थिति :- हिण्डन नदी के किनारे मेरठ उत्तर प्रदेश।

प्राप्त सामग्री :- मिट्टी के बर्तन पर गिलहरी एवं मोर की चित्रकारी के साक्ष्य,मनके और पिण्ड के साक्ष्य।
(यहां से मात्र देवी की मूर्ति और मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।)

राखीगढ़ी :-  राखीगढ़ी भारत का सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल है। दूसरा धौलावीरा है। (हडप्पा सभ्यता का सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल मोहनजोदड़ो दूसरा राखीगढ़ी हैैं।)


खोजकर्ता :- सूरजभान और आचार्य भागना देव।

अवस्थिति :- जींद, हरियाणा।

प्राप्त सामग्री :- ताबे का उपकरण, हड़प्पाई लिपि युक्त मुद्रा।

रंगपुर (गुजरात) :- 


खोजकर्ता :- 1931 एम.एस. वत्स 

अवस्थिति :- गुजरात के मादर नदी या भादर नदी ( काठियावाड़ प्रायद्वीप में)

प्राप्त सामग्री :- धान की भूसी के साक्ष्य,ज्वार बाजरा,नालिया कच्ची ईंट का दुर्ग, पत्थर के फलक।
मातृ देवी की मूर्ति एवं मुद्रा के साक्ष्य नहीं मिले।

मांडा ( जम्मू कश्मीर) :- हड़प्पा का सबसे उत्तरीय स्थल


खोजकर्ता :- 1982 जगपत जोशी 

अवस्थिति :- चिनाब नदी (जम्मू कश्मीर)

प्राप्त सामग्री :- चार्ट, ब्लेड,मुहर ,हड्डी के वाणाग्र आदि।

बनावली :-

हरियाणा के हिसार जिले के सरस्वती नदी के किनारे स्थित है।
खोजकर्ता :- 1974 रविन्द्र सिंह विष्ठ
प्राप्त सामाग्री :-
मिट्टी का हाल 
अच्छे किस्म की जौ की प्राप्ति

नगर योजना :-
सिन्धु सभ्यता को नगरीय सभ्यता के नाम से जाना जाता है
क्योंकि नगर जैसे भवन टीले(निवास स्थान),सड़के,नालिया एवं गलियों के साक्ष्य मिले।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो को उच्च कोटि का नगर कहां गया। क्योंकि यहां के भवन ऊँचे होते थे।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से दो टीले मिले। जो निम्न है।
1.पूर्वी टीला :
इसेे नगर के नाम से जाना जाता है।
क्योंकि इस टीले में नगर के लोग निवास करते थे।

2. पश्चिमी टीला :-
इस टीले को दुर्ग (किला) की संज्ञा दी गयी है। क्योंकि इसमें प्रशासन या उसका परिवार निवास करता था।

सड़के :-
सिन्धु सभ्यता की सड़कें एक सीधी दिशा में एक दूसरे को समकोण पर कटती हुई। नगर को चतुर्भुजाकार में बाँट देती थी। मुख्य सड़क की चौड़ाई 39 फ़ीट तथा अन्य सड़के 9से 12 फुट होती थी।हालाकि यहा की सड़कें कच्ची होती थी।किन्तु सफाई की व्यवस्था अच्छी थी। नालियां एवं गलियां पक्की ईटो की  बनी होती थी। गलिया 4फीट की होती थी।

सिंधु कालीन संस्कृति :-


1. सामाजिक जीवन
2.  आर्थिक जीवन
3.  धार्मिक जीवन
4. राजनीतिक जीवन


सामाजिक जीवन :- 

सिन्धु समाज मातृसत्तात्मक समाज था। क्योंकि माता के नाम पर वंश चलता था। इस समाज को 4 वर्गों में बांटा गया था।
विद्वान वर्ग 
योद्धा वर्ग 
व्यापारी वर्ग/शिल्पकार वर्ग 
श्रमिक वर्ग
हिंदू समाज के लोग शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों होते थे।

आर्थिक जीवन :-

सिंधु वासियों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन तथा कृषि था।
इनकी मुख्य फसल गेहूं और जौ थे। और अन्य फसल धान बाजरा और कपास थे।
धान का साक्ष्य लोथल से तथा बाजरा का साक्ष्य पंजाब के रंगपुर से मिला।
कपास उत्पन्न करने का सर्वप्रथम श्रेय सिंधु वासियों को दिया गया है। यूनानी कपास उत्पादन क्षेत्र को सिंडन या सिनडोन के नाम से पुकारते थे।
सिंधुवासी निम्न पशुओं को पालते थे।
गाय,बैल,भैंस,भेड़, कुत्ता,हिरन,घोड़ा तथा हाथी के साक्ष्य मिले।
गुजरात के सुरकोतडा नामक स्थान से घोड़े के अस्थि पंजर के साक्ष्य मिले।
सिन्धु वासियों का मुख्य उद्योग कपड़ा बुनना तथा रंगाई करना था। इनका विदेशी व्यापार उच्च कोटि का था।
निम्न देशों के साथ विदेशी व्यापार होता था।
● मिस्र                               नील नदी
● मेसोपोटामिया              दजला फ़रात नदी
● ईरान                            चाँदी का आयात
● अफगानिस्तान                टिन का आयात

मिस्र नील नदी के किनारे, मेसोपोटामिया दजला फरात नदी के किनारे बसा है। सिंधु वासी इरान से चांदी का आयात करते थे तथा अफगानिस्तान से टिन का आयात करते थे।
तथा राजस्थान खेतड़ी की खान से ताबा मंगवाते थे। तांबा तथा टिन मिलाकर काँसा बनाते थे।

धार्मिक जीवन :-

सिंधु काल तक मंदिर का साक्ष्य नहीं मिला किंतु इनके धर्म का ज्ञान हमें विभिन्न मुद्राओं,मूर्तियों तथा विभिन्न पाषाण प्रतिमाओं से मिलता है।
सिंधुवासी मुद्राओं को ताबीज के रूप में धारण करते थे।
जिन पर विभिन्न देवी-देवताओं के चिन्ह खुदे होते थे।
हिंदू समाज में स्त्रियों को देवी या मातृ देवी के रूप में देखा गया। भगवान शिव तथा शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व था। स्त्री पुरुष उपासना के साथ विभिन्न पक्षियों, पशुओं तथा वृक्षों की भी उपासना होती थी।
भगवान शिव का वाहन कुबड़ वाला बैल,पाख्ता नाम की पक्षी, तथा वृक्ष का विशेष महत्व था।

राजनैतिक जीवन :- 

सिंधु वासियों के राजनीतिक जीवन के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती है।
सिंधु समाज पूरी तरह से धर्म पर आधारित था। पुरोहित लोग धर्म के मालिक होते थे और समाज में प्रशासक का कार्य भी करते थे। तथा पश्चिमी टीले में निवास करते थे।
और वही से नगर की रक्षा करते थे। नगर के लोग कर के रूप में जो अनाज देते थे उसे अन्नागार में रखा जाता था।
सिंधु सभ्यता का पतन बाढ़ की वजह से माना जाता है।


●सिंधु सभ्यता से संबंधित वन लाइनर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर इस प्रकार है।



●सिंधु सभ्यता आद्य ऐतिहासिक सभ्यता है।
●सिंधु सभ्यता का काल रेडियो कार्बन तिथि निर्धारण के आधार पर 2500 से 1700 ई०पू० माना जाता है।
●सिंधु सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी।
●सिंधु सभ्यता का विस्तार त्रिभुजाकार है।
●सिंधु सभ्यता से प्राप्त होने वाले बड़े नगर मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, धौलावीरा, कालीबंगा है।
●भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हड़प्पा सभ्यता के सर्वाधिक पुरातत्व का उत्खनन गुजरात में किया गया।
●हड़प्पा संस्कृति की मोहरो एवं टेराकोटा कलाकृतियों में गाय का चित्र नही मिलता,जबकि बैल,हाथी,गेंडा,बाघ,हिरण,भेड़ आदि पशुओं का अंकन मिलता है।
●लोथल से गोदीबाड़ा के साक्ष्य मिले है।
●हरियाणा के बनावली से पक्की मिट्टी की बनी हुई हल की प्रतिकृति मिली है।
●सैंधव सभ्यता के विशाल स्नानागार का साक्ष्य मोहन जोदड़ो से प्राप्त हुआ है।
●राजस्थान के कालीबंगा से जूते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
●सिंधु सभ्यता कांस्य युगीन सभ्यता थी यहां के लोग लोहे से परिचित नहीं थे।
●रंगपुर गुजरात से धान की भूसी के साक्ष्य मिले।
●सिंधु घाटी के लोग पशुपति शिव की पूजा करते थे इसका साक्ष्य मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर है जिस पर योगी की आकृति बनी है।
उस योगी के दाएं ओर बाघ और हाथी तथा बाएं ओर गैंडा और भैंसा चित्रित किए गए हैं।


संक्षेप में हड़प्पा सभ्यता या सिंधु सभ्यता या नगरीय सभ्यता या कास्ययुगीन सभ्यता


●सिंधु सभ्यता संबंधित है आद्य ऐतिहासिक काल से (2500BC - 600BC)
सर्वप्रथम काँस निर्माण के तकनीक की जानकारी प्राप्त हुई थी :- हड़प्पा सभ्यता से।
सर्वप्रथम और सर्वाधिक ताँबे का उपयोग :- हड़प्पा वासियों ने।
हड़प्पा सभ्यता के उद्भव को दो सिद्धांतों के अंतर्गत बांटा गया है।
● वैदेशिक उद्भव का सिद्धांत
● स्थानीय उद्भव का सिद्धांत


वैदेशिक उद्भव का सिद्धांत :- 


हड़प्पा सभ्यता के जनक दक्षिण मेसोपोटामिया के सुमेरियाई लोग थे। 
इस मत के समर्थक विद्वान डी.एच. गार्डनर, सर जॉन मार्शल, व्हीलर, राखालदास बनर्जी, दयाराम साहनी थे।

स्थानीय उद्भव का सिद्धांत :- 


हड़प्पा सभ्यता का उद्भव स्थानीय नवपाषाण कालीन बस्तियां थीं।
इस मत के समर्थक विद्वान अल्विन दंपत्ति, डीपी अग्रवाल, रफीक मुगल, सर रंगनाथ राव, आर. एस. बिष्ट थे।

●हड़प्पा नामक पुरास्थल की सर्वप्रथम जानकारी दी थी
चार्ल्स मैसेन ( सन 1826 में)।
●1856 में कराची से लाहौर के बीच रेलवे लाइन निर्माण के समय हड़प्पा पुरास्थल की जानकारी ब्रिटिश अधिकारी जान विलियम ब्रंटन के माध्यम से मिली।
●भारतीय पुरातत्व के पिता के उपनाम से प्रसिद्ध अलेक्जेंडर कनिंघम ।
●हड़प्पा सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार है।
●हड़प्पा सभ्यता का क्षेत्रफल 1299600 वर्ग km है।
●हड़प्पा सभ्यता की जुड़वा राजधानी स्टुअर्ट पिगट महोदय के अनुसार हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो है।
लघु हड़प्पा तथा लघु मोहनजोदड़ो लोथल है।

●सिंधु सभ्यता की दक्षिणतम सीमा :- दैमाबाद (महाराष्ट्र) जिला अहमदाबाद नदी प्रवरा गोदावरी की सहायक।

●सिंधु सभ्यता की उत्तरतम सीमा :- मांडा (जम्मू कश्मीर) जिला अखनूर नदी चिनाब।

●सिंधु सभ्यता की पूर्वतम सीमा :- आलमगीरपुर(उत्तर प्रदेश)
जिला मेरठ नदी हिंडन।

●सिंधु सभ्यता की पश्चिमी सीमा :- सुतकागेन्डोरे(ब्लूचिस्तान,पाकिस्तान) नदी दश्क ।

●सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल ( क्रम से) :-
मोहनजोदड़ो, गानेरीवाला,हड़प्पा,धौलावीरा,राखीगढ़।

●भारत का सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल (क्रम से) :-
धौलावीरा(गुजरात),राखीगढ़(हरियाणा)।

●हड़प्पा सभ्यता के पूरब से पश्चिम तक की लंबाई 
1600km
●हड़प्पा सभ्यता के उत्तर से दक्षिण तक की लंबाई
1400km

●हड़प्पाई लिपि को पढ़ने की शुरुआत सर्वप्रथम की :-
वैडिल महोदय (1925) में।
●हड़प्पाई लिपि को वैज्ञानिक पद्धति से पढ़ने की शुरुआत सर्वप्रथम की :- हंटर महोदय(1934) में।
●हड़प्पाई लिपि का क्रम :- दायें से बाएं उसके पश्चात बाएँ से दायें ।
●हड़प्पाई लिपि की इस शैली को वास्त्रोफेदन या गौमूर्तिका या हलावर्त शैली कहा जाता है।

●मेसोपोटामिया की लिपि को कीलाक्षर तथा मिस्र की लिपि को हायरोग्लिफिक कहते है।

●हड़प्पाई लिपि में लगभग 400 अक्षर हैं और यह चित्राधर लिपि है। (पिक्टोग्राफिकल स्क्रिप्ट)

हड़प्पा सभ्यता का काल/तिथि निर्धारण 


●रेडियो कार्बन परीक्षण C-14 के अनुसार 
2350 से 1750BC
●जान मार्शल के अनुसार
3250 से 2750BC
●फेयर सर्विस के अनुसार
2000 से 1500BC
●मैक के अनुसार
2800 से 2500BC
●व्हीलर के अनुसार
2500 से 1500BC
●डी. पी.अग्रवाल के अनुसार
2300 से 1750BC (सर्वाधिक मान्य तिथि)

●हड़प्पाई शहर दो भागों में विभाजित थे ।

पश्चिमी भाग :- यह भाग किला बंद होता था इसमें प्रशासकीय वर्ग निवास करते थे।

पूर्वी भाग :- यह भाग किला बंद नहीं होता था इसमें बस्ती के सामान्य लोग निवास करते थे।

हड़प्पा सभ्यता में सड़कें :-(8से10मीटर चौड़ी होती थी)
प्रायः एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।
जिसे ऑक्सफोर्ड सर्किल कहा जाता था। सड़कें प्रायः कच्ची थी।

●हड़प्पा सभ्यता के घनाकार ईंटो का अनुपात 4:2:1था।इनकी माप प्रायः 24:14:7 cm थी।

●हड़प्पा सभ्यता का समाज सम्भवतः मातृ सत्तात्मक समाज था।

●हड़प्पावासी मुख्यतः चार प्रजाति से संबंधित हैं :-

1.भूमध्य सागरीय ( हड़प्पावासियों में सर्वाधिक भूमध्य सागरीय प्रजातिय के लोग निवास करते थे।)
2.अल्पाइन
3.माँगोलाइड
4.प्रोटो अस्ट्रोलॉयड

सर्वप्रथम विश्व में कपास की खेती का प्रारम्भ हड़प्पावासियों ने की तथा कपास को यूनानियों ने सिंडन कहकर पुकारा।

हड़प्पावासी किस कीमती पत्थर का बहुतायत प्रयोग करते थे :- लॉजवर्जमणि (बदख्शां, अफगानिस्तान) से प्राप्त करते थे।

हड़प्पा सभ्यता के पतन का विद्वानों में मत 


हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण             विद्वान के मत 
● आर्यों का आक्रमण                             व्हीलर महोदय
● प्रशासनिक शिथिलता                           जॉन मार्शल 
● जलवायु परिवर्तन            आरेल स्टाइन,अमलानंद घोस                       
● मलेरिया                                                  कैनेडी
● भू तात्विक परिवर्तन                                  डेल्स
● बाढ़                                                         मैके
● आग के कारण सभ्यता का विनाश      डी. डी.कौशाम्बी       
● नदियों के मार्ग परिवर्तन के कारण              लैम्ब्रिक



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