बाल विकास का अर्थ एवं प्रकृति । बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक । बाल विकास के सिद्धांत । वंशानुक्रम । वातावरण | baal vikash ka arth | baal vikash ke siddhant | vatavaran | vanshanukram

 बाल विकास का अर्थ एवं प्रकृति । बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक । बाल विकास के सिद्धांत । वंशानुक्रम । वातावरण | baal vikash ka arth | baal vikash ke siddhant | vatavaran | vanshanukram 


विकास (Development) :-


किसी बालक के विकास से आशय शिशु के गर्भाधान (गर्भ में आने) से लेकर पूर्ण प्रौढता प्राप्त करने की स्थिति से है।
पिता के सूत्र (sperms) तथा माता के सूत्र (ovum) के संयोग से एक जीव उत्पन्न होता है। तत्पश्चात उसके अंगों का विकास होता है यह विकास की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है इसी के फलस्वरूप बालक विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरता है परिणाम स्वरूप बालक का शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक विकास होता है।

मुनरो के शब्दों में :- परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था जिसमें बच्चा भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की स्थिति से गुजरता है, विकास कहलाता है।

 गैसेल के शब्दों में :-  विकास सामान्यतः प्रयत्न से अधिक महत्व रखता है, विकास का अवलोकन किया जा सकता है और किसी सीमा तक इसका मापन एवं मूल्यांकन भी किया जा सकता है जिसके तीन रूप होते हैं।
 शरीर निर्माण
 शरीर शास्त्र
 व्यवहार के चिन्ह

 बाल विकास की कुछ अन्य परिभाषाएं एवं अर्थ :-

विकास को क्रमिक परिवर्तनों की श्रृंखला भी कहा जाता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं का उदय होता है तथा पुरानी विशेषताओं की समाप्ति हो जाती है।

 ड्रेवर के अनुसार :- विकास, प्राणी में होने वाला प्रगतिशील परिवर्तन है जो किसी लक्ष्य की ओर लगातार निर्देशित होता रहता है।

 हरलॉक के अनुसार :- विकास केवल अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है वरन वह व्यवस्थित तथा समनुगत  परिवर्तन है जिसमें कि प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं एवं योग्यताएं प्रकट होती हैं।

 क्रो एंड क्रो के अनुसार :- बाल विकास वह विज्ञान है जिसमे बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्युपर्यंत तक चलता है।

 सोरेनसन के अनुसार :-  शरीर के अंगों में होने वाले परिवर्तन को विकास कहते हैं विकास का संबंध वृद्धि से होता है शरीर की हड्डियों के आकार में वृद्धि होने के कारण कड़ी हो जाती हैं तथा उनके रूप में भी परिवर्तन आ जाता है मनुष्य का जन्म से मृत्यु तक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास होता रहता है।

बाल मनोविज्ञान के क्षेत्र :-


बाल मनोविज्ञान में निम्नलिखित अवधारणाओं का वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन किया जाता है।

1. मानव के विकास का अध्ययन
2. विकास की विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले मानसिक परिवर्तनों का अध्ययन
3. बालक के रूचियों का अध्ययन
4. बालक के संवेग का अध्ययन
5. बालक की रचनात्मक सृजनशीलता का अध्ययन
6. बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारकों, अवधारणाओं का अध्ययन
7. अधिगम प्रक्रियाओं का अध्ययन
8. बुद्धि का अध्ययन
9. बाल प्रवृत्तियों का अध्ययन
10. बालक का व्यक्तित्व सामाजिक समायोजन।

 बाल विकास के रूप :-

 
विकास की प्रक्रिया चार प्रकार की होती है-

1. आकार में परिवर्तन :-  शारीरिक विकास क्रम में आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर के आकार व भार में निरंतर परिवर्तन होता रहता है।

2. अनुपात में परिवर्तन :- सभी अंगों के विकास का एक निश्चित अनुपात नहीं होता है।

3. पुरानी रूपरेखा में परिवर्तन :-  प्राणी के विकास क्रम में नवीन विशेषताओं का उदय होने से पूर्व पुरानी विशेषताओं का लोप होता रहता है।

4. नए गुणों की प्राप्ति :- विकास क्रम में जहां एक तरफ पुरानी रूपरेखा में परिवर्तन होता है वही उसका स्थान नए गुण प्राप्त कर लेते हैं। जैसे स्पष्ट उच्चारण करना, स्थाई दांत निकलना आदि।

बाल विकास के सिद्धांत :- 

बाल विकास के कुछ प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं।

1. निरंतरता का सिद्धांत :- इस सिद्धांत के अनुसार विकास एक न रुकने वाली प्रक्रिया है, मां के गर्भ से ही यह प्रक्रिया आरंभ हो जाती है और मृत्युपर्यंत चलती रहती है।


2. व्यक्तित्व भिन्नता का सिद्धांत :- बालकों का विकास एवं वृद्धि उनकी वैयक्तिकता के अनुरूप होता है। बालक अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी के कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताए देखने को मिलती हैं।


 गैसेल के अनुसार :-  दो व्यक्ति समान नहीं होते, परंतु सभी बालकों के विकास का क्रम समान होता है।

विकास के इसी सिद्धांत के कारण कोई बालक अत्यंत मेधावी, कोई बालक सामान्य तथा कोई बालक पिछड़ा या मंद होता है।

3. विकास क्रम की एकरूपता :- इस क्रम में एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएं देखने को मिलती हैं उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर से आरंभ होती है।


 4.वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक सी नहीं रहती :-

शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है परंतु बाद के वर्षों में मंद पड़ जाती है पुनः किशोरावस्था के आरंभ में इस गति में तेजी आ जाती है परन्तु यह अधिक समय तक भी नही बनी रहती है।

 5.विकास सामान्य से विशिष्ट (विशेष) की ओर चलता है :-

विकास क्रम में कोई भी बालक पहले सामान्य क्रियाएं करता है उसके बाद विशेष क्रियाओ की ओर अग्रसर होता है।

6.परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत :-

विकास के सभी आयाम जैसे शरीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक,आदि एक-दूसरे से परस्पर सम्बंधित है। इनमे से किसी एक आयाम में होने वाला विकास अन्य सभी आयामो में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

7.एकीकरण का सिद्धांत :-

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती है।
इसके अनुसार बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सिखाता है। इसके बाद वह उन भागो में एकीकरण करना सीखता है।

8.विकास की दिशा का सिद्धांत :-

इस सिद्धांत के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है।
इस सिद्धांत को दो भागों में बांटा गया है-
(i) शिर पदाभिमुख दिशा
(ii)समीप दूराभिमुख दिशा

शिर पदाभिमुख दिशा :-

इस सिद्धांत के अंतर्गत विकास सिर से पैर की ओर एक निश्चित दिशा में होता है।
बालक जन्म के कुछ समय पश्चात पहले अपने सिर को नियंत्रित करता है फिर अपने हाथों की गति पर नियंत्रण  करता है।


समीप दूराभिमुख दिशा :- 

इस सिद्धांत के अंतर्गत विकास शरीर के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर होता है।
इसके अंतर्गत सबसे पहले रीढ़ की हड्डी का विकास होता है तत्पश्चात अन्य अंगों का विकास होता है।
उदाहरण के लिए कोई बालक सबसे पहले अपने शरीर पर नियंत्रण करना सीखता है। फिर अपने हाथ की अंगुलियों पर फिर अपनी बाहों पर नियंत्रण कर लेता है।

9.विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है :-


10.विकास लम्बवत (सीधा) न होकर वर्तुलाकार होता है :-
बालक का विकास एक समान गति से नही होता बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर अपने विकास को परिपक्व और स्थाई बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह आगे बढ़ता है।

11. वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम एवं वातावरण का संयुक्त परिणाम है। :-


12.विकास एक अविराम प्रक्रिया है। :-

विकास एक अविराम प्रक्रिया है, प्राणी के जीवन मे यह निरंतर चलता रहता है।

13.विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है :-


14.विकास में व्यक्तिगत विभेद सदैव स्थिर रहते है। :-

प्रत्येक बालक में शारिरिक व मानसिक योग्यताओं की मात्रा भिन्न भिन्न होती है। इस कारण समान आयु के दो बालक व्यवहार में समानता नही रखते है।

15.विकास की गति में तीव्रता व मंदता पाई जाती है:-

किसी भी प्राणी का विकास सदैव एक ही गति से आगे नही बढ़ता है,उसमे निरंतर उतार चढ़ाव होते रहते है।

# बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक :-

बालक के विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्न लिखित है।
1.आन्तरिक कारक :-
वंशानुक्रम, 
शारीरिक कारक,
बुद्धि,
संवेगात्मक कारक,
सामाजिक प्रकृति।

2.वाह्य कारक :-
वातावरण
पारिवारिक स्थिति
जीवन की घटनाएं,
सामाजिक स्थिति, 
आर्थिक स्थिति ।
विद्यालय
संचार माध्यम। आदि

वंशानुक्रम (Heredity):-


"माता-पिता से संतानों को प्राप्त गुण ही वंशानुक्रम है।"
दूसरे शब्दों में "पैतृक गुणों का स्थानांतरण ही वंशानुक्रम है।"
 वंशानुक्रम को आनुवंशिकता भी कहते हैं अनुवांशिक लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचना है वंशानुक्रम या आनुवंशिकता कहलाता है।

वंशानुक्रम की अन्य परिभाषाएं:-

वुडवर्थ के अनुसार :-
वंशानुक्रम में वे सभी बातें आ जाती हैं, जो जीवन का आरंभ करते समय, जन्म के समय नहीं, वरन गर्भाधान के समय, जन्म से लगभग नौ माह पूर्व व्यक्ति में उपस्थित थीं।

बी एन झा के अनुसार :-
वंशानुक्रम व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओं का पूर्ण योग है।

डिंकमेयर के अनुसार :-
वंशानुगत कारक वे जन्मजात विशेषताएं हैं जो बालक में जन्म के समय से ही पाई जाती हैं।

सोरेनसन के अनुसार :-
पित्रैक, बच्चों की प्रमुख विशेषताओं और गुणों को निर्धारित करते हैं, पित्रैको के सम्मिलन के परिणाम को हम वंशानुक्रम कहते हैं।

पी० जिस्बर्ट के अनुसार :-
मिली-जुली गठरी को वंशानुक्रम के नाम से पुकारा जाता है।(short)
 
वंशानुक्रम की संरचना :-

अनुवांशिक लक्षण, वे लक्षण होते हैं जो माता-पिता से संतानों को प्राप्त होते हैं।
आनुवांशिक लक्षणों का वाहक जीन है।
जीन डी.एन.ए. का छोटा सा खंड है जिसमें अनुवांशिक सूचनाएं निहित होती हैं। 
मनुष्य में 46 गुणसूत्र पाया जाता है।

       पुरूष                                          स्त्री
    (44+XY)                                   (44+XX)
      शुक्राणु                                        अण्डाणु
          |                                                  |
     X      Y                                         X    X

           महिला    पुरूष ----       X              Y
              |
             X                      XX (girl)    XY (boy)
             
             X                     XX (girl)     XY (boy)

XX गुणसूत्र = लड़की
XY गुणसूत्र = लड़का
परिणाम
50% संतान लड़की
50% संतान लड़का

मनुष्य में 23 जोड़ी (46 गुणसूत्र) पाए जाते हैं 22 जोड़ी गुणसूत्र पुरुष तथा स्त्री में समान होते हैं। 23वे जोड़ी का गुणसूत्र पुरुष में XY तथा स्त्री में XX द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

 वंशानुक्रम/आनुवंशिकी के सिद्धांत और नियम :-


(i) बीज कोष की निरंतरता का सिद्धांत
(ii) समानता का सिद्धांत
(iii) विभिन्नता का सिद्धांत
(iv) प्रत्यागमन का सिद्धांत
(v) अर्जित गुणों  के वितरण का सिद्धांत
(vi) मेण्डल का नियम 

(i) बीज कोष की निरंतरता का सिद्धांत :-

इस सिद्धांत के प्रतिपादक बीजमैन है।
शरीर का निर्माण करने वाला जीवाणु कभी नष्ट नहीं होता यह अंडकोष और शुक्रोष के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होता रहता है।

(ii) समानता का सिद्धांत :-

प्रत्येक जीव की विशेषता होती है कि वह अपने सामान बच्चे को जन्म देता है।
जैसे मानव की संतान मानव एवं पशु की संतान पशु।

(iii) प्रत्यागमन का सिद्धांत :

विपरीत गुणों का उत्पन्न होना ।
जैसे बुद्धिमान माता-पिता की संतान का मूर्ख होना तथा मूर्ख माता-पिता की संतान का तीव्र बुद्धि वाला होना।

(iv) जीव सांख्यिकी सिद्धांत :-

इसी सिद्धांत के प्रतिपादक फ्रांसिस गॉल्टन हैं।
सन्ताने  केवल माता-पिता से ही सभी गुणों को नहीं प्राप्त करती हैं बल्कि पितामह और उससे भी कई पीढ़ियों के आगे की विशेषताओं का संक्रमण होता है, पितृपक्ष से ही गुण नहीं आते मातृ पक्ष से भी गुणों का संक्रमण उसी अनुपात में होता है।

(v) अर्जित गुणों के अवितरण का सिद्धांत :-

माता-पिता के जीवन में अर्जित गुणों का संक्रमण उनकी संतानों में नहीं होता है।

(vi) अर्जित गुणों के वितरण का सिद्धांत :-

अर्जित गुणों का वितरण संतानों में होता है।

जैसे :- (i)लैमार्क का अध्ययन जीराफ़ पर।
(ii) डार्विन के अध्ययन के अनुसार प्राणी या व्यक्ति को जीवित रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है जिनमें संघर्ष की क्षमता होती है वह जीवित रहते हैं जो कमजोर होता है वह संघर्ष नहीं कर सकता और वह नष्ट हो जाता है।

(vii) भिन्नता का सिद्धांत :-  

सारेंसन के अनुसार :-
बीज कोष में अनेक जीन होते हैं जो विभिन्न प्रकार से संयुक्त होकर एक दूसरे से भिन्न बच्चों का निर्माण करते हैं। 
वंश सूत्रों के संयोग में 167 77 216 प्रकार की विभिन्नताओं की संभावना होती है।

बालक पर आनुवंशिकी /वंशानुक्रम का प्रभाव :-


● शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव (कार्ल पियर्सन)
● बुद्धि पर प्रभाव :- (गोडार्ड का मत है) :-
मंदबुद्धि माता पिता की संतान मंदबुद्धि तीव्र बुद्धि माता पिता की संतान तीव्र बुद्धि वाली होती हैं।
● चरित्र पर प्रभाव (डगडेल का मत है) :-
माता पिता के चरित्र का प्रभाव भी उनके बच्चों पर पड़ता है। (ज्यूक नामक वंशज 1877)
● व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव(कैटेल)
● मूल शक्तियों पर प्रभाव(थार्नडाइक)
● प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव(क्लीन वर्ग)
● सामाजिक स्थिति पर प्रभाव(विनशिप)
● महानता पर प्रभाव(गॉल्टन)
●संचयी प्रभाव(कोलेसनिक)

बालकों पर वातावरण का प्रभाव :-

वातावरण के लिए पर्यावरण शब्द का प्रयोग किया जाता है पर्यावरण दो शब्दों से बना है
परि+आवरण।
परि का अर्थ चारो ओर और
आवरण का अर्थ ढ़कने वाला।
अतः हम कह सकते हैं व्यक्ति के चारों ओर जो कुछ है वही वातावरण है।

वातावरण की परिभाषा :-
रॉस के अनुसार :-
वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।

एनास्टसी के अनुसार :-
वातावरण वह हर वस्तु है जो व्यक्ति के पित्रैक के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करता है।

जिसबर्ट के अनुसार :-

जो किसी एक वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए हैं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है वह पर्यावरण होता है।

वातावरण संबंधित कारक :-


(i) सामाजिक कारक
(ii) आर्थिक कारक
(iii) सांस्कृतिक कारक



आनुवंशिकता तथा वातावरण का प्रभाव :- 


शारीरिक अंतर पर प्रभाव (फ़्रेंज बोन्स) :- का मत है

विभिन्न प्रजातियों के शारीरिक अन्तर का कारक वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।

मानसिक विकास पर प्रभाव (गार्डन) :-  का मत है

उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण न मिलने पर मानसिक विकास की गति धीमी हो जाती है

प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव (क्लार्क) :- का मत है

कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम ना होकर वातावरण है उन्होंने यह मत अमेरिका के कुछ गोरे और निग्रो लोगों की बुद्धि परीक्षा लेकर सिद्ध किया।

बुद्धि पर प्रभाव :-(कैङोल) का मत है :-

बुद्धि के विकास में वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का प्रभाव कहीं अधिक पड़ता है।

व्यक्तित्व पर प्रभाव :-(कुले) का मत है :-

व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है।

वॉटसन के अनुसार :-
वातावरण के प्रभाव से शिशु को डॉक्टर, वकील, कलाकार, नेता आदि कुछ भी बनाया जा सकता है भले ही शिशु का आनुवंशिकी कुछ भी रहा हो तथा एक समाज के व्यक्ति, शारीरिक और मानसिक दृष्टि से आसमान होते हैं।

इन असमानताओं या विभिन्नताओं का कारण कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वंशानुक्रम है तथा अन्य के अनुसार विभिन्नताओं का कारण वातावरण है।

पीटरसन के अनुसार :-
व्यक्ति को उसके माता-पिता के द्वारा उसके पूर्वजों से जो प्रभाव प्राप्त होता है वही उसका वंशानुक्रम है।

वुडवर्थ और मारिक्वस :-
वंशानुक्रम में वे सभी कारक आ जाते हैं जो व्यक्ति में जीवन आरंभ के समय उपस्थित होते हैं जन्म के समय नहीं वरन गर्भाधान के समय अर्थात जन्म से लगभग 9 माह पूर्व उपस्थित होते हैं।

डिंकमेयर के अनुसार :-
वंशानुगत कारक में जन्मजात विशेषताएं हैं जो बालक में जन्म के समय से पायी जाती है।

● बुद्धि के निर्धारण में वातावरण तथा आनुवंशिकता दोनों का महत्व है ना की किसी एक का।

एच. ई. ग़ैरेट :-
वंशानुक्रम औऱ वातावरण एक दूसरे को सहयोग देने वाले प्रभाव या कारक हैं तथा दोनों ही बालक की सफलता के लिए आवश्यक हैं।


वंशानुक्रम एवं वातावरण का संबंध :-


वुडवर्थ तथा मारेक्विस :- 

व्यक्ति वंशानुक्रम तथा वातावरण का योग नहीं, गुणनफल है।
क्रो -क्रो :-

व्यक्ति का निर्माण न केवल वंशानुक्रम और न केवल वातावरण से होता है वास्तव में वह जैविकदाय और सामाजिक विरासत के एकीकरण की उपज है।

लैंडिश के अनुसार :- 
वंशानुक्रम हमें विकसित होने की क्षमताएं प्रदान करता है क्षमताओं के विकसित होने के अवसर हमें वातावरण से मिलते हैं।



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