भारत का भूगोल भाग :- 12 भारत की प्राकृतिक वनस्पति । prakrtik vanaspati
भारत की प्राकृतिक वनस्पति । prakrtik vanaspati
प्राकृतिक वनस्पति
●इन वनों में पाए जाने वाले व्यापारिक महत्व के कुछ वृक्ष रबड़, सिनकोना,आबनूस(एबोनी),महोगनी,
वनस्पति जगत शब्द का अर्थ किसी विशेष क्षेत्र में किसी समय में पौधों की उत्पत्ति से है।
प्राकृतिक वनस्पति का अर्थ है की वनस्पति का वह भाग जो मनुष्य की सहायता के बिना अपने आप पैदा होता है। और लंबे समय तक उस पर मानवीय प्रभाव नहीं पड़ता अक्षत वनस्पति कहलाता हैं।
भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 51% भाग पर कृषि, 21.05% पर वन और 4% भाग पर चारागाह तथा 24% भाग पर बंजर भूमि है।
वनस्पति के प्रकार
भारत में निम्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियां पाई जाती हैं।
●उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
●उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
●उष्णकटिबंधीय कटीले वन तथा झाड़ियां
●पर्वतीय वन
●मैंग्रोव वन
उष्णकटिबंधीय वर्षा वन या उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन :-
●ये वन भारत के उन भागों में पाए जाते हैं जहां 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा के साथ थोड़े समय के लिए एक शुष्क ऋतु पाई जाती है।
●इन वनों में वृक्ष 60 मीटर या इससे अधिक ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं
●ये वन पश्चिमी घाटों के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों लक्ष्यदीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, असम की ऊपरी भागों, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, तमिलनाडु के तट, कर्नाटक के पश्चिमी भागों, हिमालय के तराई तक पाए जाते है।
●वृक्षों में पतझड़ होने का कोई निश्चित समय नहीं होता इसलिए यह वन साल भर हरे भरे लगते है।
●इन वनों में पाए जाने वाले व्यापारिक महत्व के कुछ वृक्ष रबड़, सिनकोना,आबनूस(एबोनी),महोगनी,
रोजवुड,नारियल, ताड़, बेंत आदि।
●इन वनों में पाए जाने वाले जानवर हाथी, बंदर ,लैमूर, हिरन,कई प्रकार के पक्षी,चमगादड़ और एक सींग वाला गैंडा असम एवं पश्चिम बंगाल के दलदली क्षेत्र में पाए जाते हैं।
उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन या पतझड़ वन या मानसूनी वन :-
●इस प्रकार के वन भारत के सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हैं।
● यह वन ग्रीष्म ऋतु में 6 से 8 सप्ताह के लिए अपनी पत्तियां गिरा देते हैं इसलिए इसे पतझड़ वाले या मानसूनी वन भी कहते हैं।
● यहां 70 सेंटीमीटर से 200 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है।
● जल की उपलब्धि के आधार पर इन वनों को दो भागों में बांटा जा सकता है
1.आर्द्र(नम)पर्णपाती वन तथा
2.शुष्क पर्णपाती वन।
1.आर्द्र(नम)पर्णपाती वन :-
● आर्द्र(नम)पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर तक होती है।
● ऐसे वन देश के पूर्वी भागो,हिमालय के गिरीपद प्रदेश, उत्तरी पूर्वी राज्यों, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिमी घाटों के पूर्वी ढालो में पाए जाते हैं।
● इन वनों में सागौन, साल, शीशम, चंदन, आम,साखू, हरड़-बहेड़ा, महुआ, हल्दू,रवैया,कुसुम,अर्जुन,शहतूत के वृक्ष पाए जाते हैं।
● सागौन इन वनों की सबसे प्रमुख प्रजाति है।
2.शुष्क पर्णपाती वन या उष्णकटिबंधीय घास के मैदान :-
●शुष्क पर्णपाती वन उन क्षेत्र में पाए जाते हैं जहां वर्षा 70 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर के बीच होती है।
● यह वन मुख्यतः मध्य गंगा मैदान से लेकर दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्र तक विस्तृत है।
● यह वन उत्तर प्रदेश तथा बिहार के मैदानी भागों में पाए जाते हैं।
● इन क्षेत्रों में सागौन, साल,पीपल, नीम के वृक्ष उगते है।
● इन क्षेत्रों के बहुत बड़े भाग कृषि कार्य में प्रयोग हेतु साफ कर लिए गए हैं। और कुछ भागो में पशुचारण भी होता है।
● यहां वर्षा ऋतु में लंबी-लंबी घास उग जाती हैं।
● इन वनों में शेर,सुअर, हिरण, हाथी, विभिन्न प्रकार के पक्षी, छिपकली, सांप, कछुए आदि पाए जाते हैं।
उष्णकटिबंधीय कटीले वन तथा झाड़ियां :-
● इन क्षेत्रों में वर्षा 70 सेंटीमीटर से कम होती है।
● यहां प्राकृतिक वनस्पतियों में कटीले वन तथा झाड़ियां पाई जाती है।
● इस प्रकार की वनस्पति देश के उत्तरी पश्चिमी भाग में पाई जाती है।
● जिसमें हरियाणा के अर्ध शुष्क क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के क्षेत्र सम्मिलित है।
● यहां की मुख्य पादप प्रजातियां नागफनी(कैक्टस), खजूर(पाम), यूफोरबिया,अकासिया,बबूल, खेजड़ा, रीठा, बेर,आँवला, रोहिड़ा, करील आदि।
● इनकी जड़ें लंबी, पत्तियां प्रायः छोटी होती है जिससे वाष्पीकरण कम से कम हो सके।
● इन जंगलों में शेर, चूहा, जंगली गधा, घोड़ा, ऊंट, खरगोश, लोमड़ी, भेड़िया आदि जानवर पाए जाते है।
पर्वतीय वन :-
● पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई बढ़ने तथा तापमान में कमी के कारण, प्राकृतिक वनस्पतियों में भी अंतर दिखाई देता है।
● 1000 मीटर से 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आर्द्र शीतोष्ण कटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले वन पाए जाते हैं। इनमेंं ओक,चेस्टनट जैसे वृक्ष पाए जाते हैं।
● 1500 से 3000 मीटर की ऊंचाई के बीच शंकुधारी वृक्ष देवदार, चीड़(पाइन),सीडर,स्प्रूस,सिल् वर-फर आदि पाए जाते है।
●ये वन प्रायः हिमालय के दक्षिणी ढलानों दक्षिण और उत्तर-पूर्वी भारत के अधिक ऊंचाई वाले भागों में पाए जाते हैं।
●3600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर शीतोष्ण कटिबंधीय वन तथा शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान पाए जाते हैं।
●इन क्षेत्रों में अल्पाइन वनस्पति,सिल्वर-फर,चीड़(पाइन), बर्च,जूनिपर आदि प्रमुख वृक्ष पाए जाते है।
● और अधिक ऊंचाई पर हिम रेखा के निकट पहुंचते-पहुंचते इन वृक्षों का आकार छोटा और झाड़ियां अल्पाइन घास के मैदान में विलीन हो जाती हैं।
● इन घास के मैदानों का उपयोग गुज्जर तथा बक्करवाल जैसी घुमक्कड़ जनजातियां पशु चारण के लिए करती हैं।
●मॉस,लीचन घास, टुंड्रा वनस्पति का एक भाग है।
● इन वनों में कश्मीरी मृग, चितरा, जंगली भेड़, तिब्बती बारासिंघा,याक, हिम तेंदुआ, रीछ, आईबैक्स, लाल पांडा, घने बाल वाली भेड़, बकरी, हिरण खरगोश, गिलहरी आदि जंतु पाए जाते हैं।
मैंग्रोव वन :-
●मैंग्रोव एक प्रकार की वनस्पति है जिसमें पौधों की जड़े पानी में डूबी रहती हैं।
● यह वनस्पति तटीय क्षेत्रों में पाई जाती है जहां ज्वार और भाटा आते रहते हैं। जिसके कारण मिट्टी और बालू तटों पर एकत्रित हो जाते हैं।
● गंगा,ब्रह्मपुत्र,महानदी,कावेरी ,कृष्णा,गोदावरी नदियों के डेल्टा भाग में यह वनस्पति पाई जाती है।
● गंगा ब्रह्मपुत्र डेल्टा से सुंदरी नामक वृक्ष पाए जाते हैं। इसके अलावा मैंग्रोव, ताड़,कैैसूरीना,नारियल, फोनिक्स, गोरनेे, नीपा नामक वृक्ष भी पाए जाते हैं।
●क्योडा,ऐंगार,नारियल, ताड़ के वृक्ष इन भागो में पाए जाते है।
● इन जंगलों में रॉयल बंगाल टाइगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुआ, कई प्रकार के सांप पाए जाते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
● भोजपत्र वृक्ष हिमालय क्षेत्र में 4500 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। इस वृक्ष में सफेद कागज की तरह छाल पाया जाता है जो लिखने के लिए प्राचीन समय से इस्तेमाल होता आ रहा है।
● खैर वृक्ष भारत में सूखे क्षेत्रों में पाए जाते हैं जिससे कत्था प्राप्त किया जाता है।
● ब्यूटीया मोनोस्पर्मा को जंगल की आग (फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट) कहां जाता है इसे पलाश अथवा ढाक के नाम से भी जाना जाता है। पलाश के फूल को उत्तर प्रदेश का राजकीय पुष्प घोषित किया गया है।
● सागौन वृक्ष का सबसे अधिक विस्तार मध्य प्रदेश में है। इसके बाद छत्तीसगढ़, उड़ीसा में हैं अर्थात मध्य भारत में सर्वाधिक विस्तार है।
● सिनकोना का वृक्ष हिमालय की तराई क्षेत्र में उगने वाला वृक्ष है।
● देवदार का वृक्ष पश्चिमी हिमालय में 1500 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर उगता है।
● सुंदरी वृक्ष पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश में फैले सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र का ज्वारी वृक्ष है।
● साल वृक्ष मुख्यतः उप हिमालय क्षेत्र, मध्य भारत के पूर्वी भाग तथा तमिलनाडु में मिलता है।
●चीड़ यह हिमालय क्षेत्र में 900 से 1000 मीटर की ऊंचाई की मध्य पाया जाता है।
●1997 में मध्यप्रदेश के साखू के वनों में कीड़े लग जाने से पूरे वन में संक्रमण फैल गये जो महामारी का रूप ले लिया।
● खेजड़ी वृक्ष को मरुस्थल का राजा कहा जाता है। खेजड़ी का उपयोग पशुओं के चारा, ईंधन तथा औषधि के रूप में किया जाता है। इसके बहुउद्देशीय उपयोग तथा अधिक तापमान सहन करने की क्षमता तथा कम पानी की आवश्यकता के कारण सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में इसे वरीयता दी गई है।
● लीसा, चीड़ के वृक्ष से प्राप्त होने वाला एक वन उपज है। इससे विरोजा तथा तारपीन का तेल बनाया जाता है। जिसका उपयोग कागज उद्योग, साबुन तथा पेंट बनाने में होता है। उत्तराखंड में लीसा स्वरोजगार एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन है।
बेंत(cane):- यह कर्नाटक, केरल, असम, ज्वारीय वनों तथा दलदलों में उगता है।
इसका उपयोग तार, रस्सियां, चटाई, टोकरी, थैली आदि बनाने में होता है।
तेंदू:- यह उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा दक्षिण पूर्वी राजस्थान में मिलता है। इसकी पत्तियां बीड़ी लपेटने में काम आती हैं।
लाख(shellac):- यह वृक्ष झारखंड में सर्वाधिक मिलते हैं। यहां देश की लगभग 60% लाख प्राप्त होते हैं। लाख का प्रयोग औषधि बनाने, रेशम रंगने, चूड़ियां, पेंट, मोम, इलेक्ट्रिकल, इंसुलेशन, स्प्रिट आदि बनाने में होता है। यह केरिला लक्का नाम के कीड़े की राल है। जो पलास, बरगद,पीपल, कुसुम, गूलर, शिशिर, सिस्सू आदि वृक्षों पर पलता है।
रेजिन:- यह चीड़ के वृक्षों से एकत्रित की जाती है। इसका उपयोग स्याही, स्नेहक पदार्थ, पेंट, आयल क्लॉथ, सीलिंग वैक्स, लिनोलियम आदि बनाने में किया जाता है।
गोंद(gums):- इसका प्रयोग चिपकाने, प्रिंटिंग, टेक्सटाइल की फिनिश,कागज छाटने,कैण्डी तथा ड्रग्स बनाने में किया जाता है।
टैनिन तथा रंग:- यह पदार्थ मैंग्रोव, अर्जुन, कैसुरिना, चेस्टनट, वैटल, आदि वृक्षों की छाल से प्राप्त होती हैं। चमड़े की खाले बनाने में टैनिन का प्रयोग किया जाता है।
रंगने के पदार्थ :- लॉग, वुड,कच,मेहंदी, चंदन,बरबेरी,
शहतूत, सागौन, सफोला, केसर, सीडर आदि पौधों तथा वृक्षों से प्राप्त होते है।
Comments
Post a Comment