भारत का भूगोल भाग :- 11 भारत की मिट्टी । जलोढ़ मिट्टी । डेल्टाई मिट्टी । काली मिट्टी । रेगुर मिट्टी । कपासी मिट्टी । लाल मिट्टी । पीली मिट्टी । लेटराइट मिट्टी । मरुस्थलीय मिट्टी । पर्वतीय मिट्टी । क्षारीय मिट्टी । लवणीय मिट्टी । मृदा अपरदन एवं सुधार । mrida aparadan aur sudhar । bharat ki mittee । jalodh mittee । deltaee mittee । kali mittee । kapasi mittee । lal mittee । letarait mittee
भारत की मिट्टी । जलोढ़ मिट्टी । डेल्टाई मिट्टी । काली मिट्टी । रेगुर मिट्टी । कपासी मिट्टी । लाल मिट्टी । पीली मिट्टी । लेटराइट मिट्टी । मरुस्थलीय मिट्टी । पर्वतीय मिट्टी । क्षारीय मिट्टी । लवणीय मिट्टी । मृदा अपरदन एवं सुधार । mrida aparadan aur sudhar । bharat ki mittee । jalodh mittee । deltaee mittee । kali mittee । kapasi mittee । lal mittee । letarait mittee
मिट्टी के अध्ययन के विज्ञान को मृदा विज्ञान (pedology) कहाँ जाता है।
● देश के 15.2% भू क्षेत्र पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●देश के 18.6% भू भाग पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●यह अम्लीय प्रकृति की मिट्टी होती है इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस की कमी होती है।
●देश के 3.7% भू भाग पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●मिट्टी का पीएच मान कम होना मिट्टी की अम्लीयता को तथा पीएच मान अधिक होना मिट्टी की क्षारीयता को बताता है।
●अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय मिट्टी सामान्य फसलों के लिए उपयुक्त नहीं होती है। सामान्य फसलें उगाने वाली मिट्टी का पीएच मान 6 से 7 के मध्य होना आवश्यक होता है।
●केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड का गठन 1953 में मृदा अपरदन एवं उनके दुष्परिणाम पर नियंत्रण हेतु किया गया।
●मरुस्थल की समस्या के अध्ययन के लिए जोधपुर में (cazri) केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान की स्थापना 1959 में की गई।
●देश का 12% भौगोलिक क्षेत्र भारतीय शुष्क क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
●भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की मिट्टी को आठ भागो में विभाजित किया है।
1. जलोढ़ मिट्टी (डेल्टाई मिट्टी) या दोमट मिट्टी या कछारी मिट्टी :-
●भारत के 43.4% क्षेत्र पर इस मिट्टी का विस्तार पाया जाता है।
●यह नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी है।
●इस मिट्टी में पोटाश,चुने की बहुलता होती है।
लेकिन नाइट्रोजन फास्फोरस एवं ह्यूमस(जीवाश्म पदार्थ) की कमी होती है।
●यह एक क्षेत्रीय मिट्टी है
●भारत में जलोढ़ मिट्टी सर्वाधिक पाई जाती है
●यह मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है
बांगर मृदा
खादर मृदा
तराई मृदा
● पुराने जलोढ़ (कछारी) मिट्टी को बांगर तथा नए जलोढ़ मिट्टी को खादर कहते हैं
●जलोढ़ मिट्टी(कछारी मिट्टी) को उर्वरता की दृष्टि से बहुत अच्छा माना जाता है इसमें धान, गेहूं, मक्का, तिलहन, दलहन, आलू आदि फसलें उगाई जाती है।
●तराई मिट्टी हिमालय क्षेत्र में भाबर के दक्षिण में पाया जाता है।
●उत्तर का विशाल मैदान, तटवर्ती मैदान नदियों के डेल्टाई भाग में पाया जाता है।
●यह मिट्टी पंजाब से असम तक के विशाल मैदानी भाग के साथ-साथ नर्मदा ताप्ती, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी घाटियों में फैली हुई है।
●गंगा में जलोढ़ मिट्टी भूमि से 600 मीटर नीचे तक पाई जाती है।
●जलोढ़ मिट्टी में सबसे कम उर्वरक की आवश्यकता होती है।
●बलुई दोमट मिट्टी की जल धारण क्षमता सबसे कम
होती है क्योंकि इसमें रवे भारी मात्रा में एवं बड़े होते हैं।
●सामान्यता दोमट मिट्टी में 40% बालू के कारण 40% चिकनी मिट्टी के कण एवं 20% गाद के कण(पांशु कण) पाए जाते हैं।
2.काली मिट्टी या रेगूर मिट्टी या कपासी मिट्टी या
उष्णकटिबंधीय चरनोजम या लावा मिट्टी :-
● देश के 15.2% भू क्षेत्र पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●इस मिट्टी का निर्माण लावा पदार्थों के विखंडन या बेसाल्ट चट्टानों के टूटने फूटने से हुआ है
●इस मिट्टी में आयरन, चूना, एल्मुनियम,एवं मैग्नीशियम की बहुलता होती है। परन्तु नाइट्रोजन, फास्फोरस जैव पदार्थों(ह्यूमस) की कमी पाई जाती है।
●इस मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की बहुलता सबसे अधिक होती है।
●इस मिट्टी का काला रंग टिटेनिफेरस मैग्नेटाइट एवं जीवाश्म की उपस्थिति के कारण होता है।
●इस मिट्टी का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाया जाता है।
●यह मिट्टी जैव पदार्थों से भरपूर होती है।
●यह 10° से 25° उत्तरी अक्षांश एवं 73° से 80° पूर्वी देशान्तर के बीच पाई जाती है।
●यह मृदा कपास की खेती के लिए उपयुक्त होता है।इसलिए इसे काली कपास मृदा कहा जाता है।
●इस मिट्टी में जुताई स्वतः होती रहती है। इसलिए इसे स्वतः जुताई वाली मिट्टी भी कहा जाता है।
●यह एक क्षेत्रीय मिट्टी है।
●इस मृदा में गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि उगाया जाता है।
●भारत मे काली मिट्टी गुजरात, महाराष्ट्र(सर्वाधिक), कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिसा,तमिलनाडु, राजस्थान,दक्कन ट्रैप, मालवापठार आदि क्षेत्रों में पाई जाती है।
● काली मिट्टी को सिंचाई की कम आवश्यकता होती है क्योंकि यह नमी रोक कर रखती है। इसमें तीव्र जल धारण की क्षमता पाई जाती है।
●पश्चिम भारत की काली मिट्टी का निर्माण लावा से हुआ है। इसलिए इसे लावा मिट्टी भी कहते है।
●यह मिट्टी सर्वाधिक प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में पाई जाती है
●इस मिट्टी को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।
●इस मिट्टी में जैव पदार्थों की भरपूरता होती है।
3.लाल मिट्टी या पीली या चॉकलेटी मिट्टी :-
●देश के 18.6% भू भाग पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●इस मिट्टी का निर्माण जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरूप रवेदार एवं कायांतरित शैलो के विघटन एवं वियोजन तथा ग्रेनाइट और नाइस चट्टानों के द्वारा हुआ।
●इस मिट्टी में सिलिका एवं आयरन की बहुलता होती है।
●यह अम्लीय प्रकृति की मिट्टी होती है इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस की कमी होती है।
●लोहे के ऑक्साइड (फेरिक आक्साइड) मिले होने के कारण इस मिट्टी का रंग लाल होता है।
लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसका रंग चॉकलेटी या पीला भी होता है।
●यह मिट्टी प्रायः उर्वरता विहीन बंजर भूमि के रूप में पाई जाती है।
● चूना का इस्तेमाल कर लाल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
●इस मिट्टी का विस्तार 5.18 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है।
●इस प्रकार यह मिट्टी देश की दूसरी विशालतम वर्ग में आती है।
●भारत मे यह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से लेकर दक्षिण में प्रायद्वीप तक पाई जाती है।
●आंध्र प्रदेश,मध्य प्रदेश के पूर्व भाग,पश्चिम बंगाल मेघालय की गारो,खासी,जयन्तिया की पहाड़ियों, राजस्थान के पूर्वी अरावली क्षेत्र,महाराष्ट्र,तमि लनाडु,नागालैंड,छोटा नागपुर पठारी क्षेत्र, कर्नाटक केे कुुुछ भागो में पाई जाती है।
4.लैटेराइट मिट्टी या मुखरैला मिट्टी :-
●देश के 3.7% भू भाग पर इसका विस्तार पाया जाता है।
●इस मिट्टी का निर्माण मानसूनी जलवायु की विशिष्टता का परिणाम है।
●इस मिट्टी में आयरन एवं सिलिका की बहुलता होती है।
●इस मिट्टी में लौह,एल्युमिनिय की बहुलता होती है जबकि नाइट्रोजन पोटास चूना तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।
●यह मिट्टी, उस उष्णकटिबंधीय प्रदेश में पाई जाती है जहां वर्षा समान्य से 200 सेंटीमीटर अधिक होती है।
●शुष्क मौसम में यह मिट्टी सूखकर ईंट की भांति कठोर हो जाती है एवं गीली होने पर लिपलिपी हो होता है।
●इस मिट्टी में चुना,नाइट्रोजन,पोटास ह्यूमस की कमी होती है।
●चुने की कमी के कारण यह मृदा अम्लीय होती है।
●यह कम उर्वरता वाली मिट्टियां होती है किंतु उर्वरकों के प्रयोग से इसमें कपास, चावल, गन्ना, दाल ,कहवा काजू, चाय ,रागी आदि की कृषि की जाती है।
●यह मिट्टी देश के 1.26 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है।
●लैटेराइट मिट्टी चाय व इलायची की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
●इस मिट्टी को
(i)भूमिगत जलवायु लैटेराइट,
(ii)लाल लैटराइट,
(iii)सफेद लैटराइट
के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
● भूमिगत जलवायु लैटेराइट मिट्टी काफी उपजाऊ होती है। क्योंकि वर्षा काल मे लौह ऑक्साइड जल के साथ घुलकर नीचे चले जाते हैं।
●लैटेराइट मिट्टी का लाल रंग लोहे के ऑक्साइड के कारण होता है।
● लाल लैटराइट में लौह-अयस्क, पोटाश तथा एल्युमिनियम की बहुलता होती है।
इस मिट्टी की इसकी उर्वरता कम होती है।
लेकिन निचले भाग में कुछ खेती की जाती है।
● सफेद लैटराइट की उर्वरता सबसे कम होती है और केओलिन के कारण इसका रंग सफेद होता है।
●महाराष्ट्र,तमिलनाडु,आंध्र प्रदेश,केरल में काजू की खेती के लिए यह मृदाएं अधिक उपयुक्त है।
●यह मिट्टियां घाटियों में पाई जाती हैं पूर्वी घाट, राजमहल पहाड़िया, सतपुड़ा, विंध्य, असम, मेघालय की पहाड़ियों के शिखरों में मिलती है।
●लैटेराइट मिट्टी सबसे अधिक केरल उसके बाद मालाबार तटीय प्रदेशों(महाराष्ट्र) में पाई जाती है।
●लैटेराइट मिट्टी प्रारूप लोहे का अतिरेक होने के कारण अनुर्वर होता जा रहा है।
●अपक्षालन एवं केशिका क्रिया ,लैटराइट मिट्टी के निर्माण में सहायक होते है।
5.मरुस्थलीय मिट्टी :-
●मरुस्थलीय मिट्टी सामान्य बलुई एवं क्षारीय होती है।
●इस मिट्टी में लवण,फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते है।
●जबकि नाइट्रोजन व जीवाश्म पदार्थों का अभाव पाया जाता है।
●इस मिट्टी में मुख्यतः मोटे अनाज की खेती की जाती है। परंतु
●इस मिट्टी में मुख्यतः मोटे अनाज की खेती की जाती है। परंतु
●जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधा है वहां कपास,गेहूं की खेती भी की जाती है।
●यह मिट्टी मुख्यतः पश्चिम राजस्थान, दक्षिण पंजाब, हरियाणा, उत्तर गुजरात में पाई जाती है।
6.क्षारीय मिट्टी या लवणीय मिट्टी या अम्लीय मिट्टी :-
●अम्लीय मिट्टी में जिप्सम का प्रयोग कर उसे क्षारीय बनाया जाता है।
●यह मिट्टी अनुर्वर होती है जिन्हें रेह, कल्लर ऊसर,थर, चोपन आदि नामों से जाना जाता है।
●इस मिट्टी का विस्तार 1 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाया जाती है।
●तटीय क्षेत्र में इस मिट्टी में नारियल, तेलताड़ की कृषि की जाती है।
●यह मिट्टी दक्षिण पंजाब,पश्चिम राजस्थान,द.हरियाणा, केरल के तट, सुंदर वन क्षेत्र में पाई जाती है।
● तेजाबी मिट्टी को कृषि योग्य बनाने के लिए सामान्यतः चुने (लाइम) का प्रयोग किया जाता है।
●मिट्टी की क्षारीयता को बदलने और उसमें खारे पन को हटाने के लिए जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) का प्रयोग किया जाता है। साथ ही चुने की लीचिंग के लिए कम से कम 1 फीट जल की भी आवश्यकता रहती है।
●भारत में सर्वाधिक लवणीय प्रभावी क्षेत्र गुजरात में है जबकि सर्वाधिक क्षारीय मृदा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में है।
●लवणीय प्रभावी मृदा को :- लवणीय, क्षारीय एवं तटीय लवणीय में विभाजित किया जाता है।
●सिंचित भूमि पर लवणी भवन होने के कारण मृदाएं अपारगम्य बन जाती हैं।
●चाय बागानों के लिए गहरी अम्लीय और अच्छे जल निकास वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है।
7.पीटमय या जैव मिट्टी या कारी :-
●इस मिट्टी में जैव तत्व, ह्यूमस की अधिकता पाई जाती है।
●यह मिट्टी भारी और काले रंग की होती है।
●इसमें पोटाश, फास्फेट की कमी होती है।
●इसका विस्तार 1लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है।
●इस मिट्टी का निर्माण भारी वर्षा, उच्च आर्द्रता भरपूर वनस्पति के द्वारा होता है।
● केरल में इस मिट्टी को कारी कहा जाता है।
●यह मिट्टी केरल के अलेपी, उत्तराखंड, अल्मोड़ा सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में पाई जाती है।
8.वनीय मिट्टी या पर्वतीय मिट्टी :-
●इस मिट्टी में जीवाश्म की अधिकता होती है।
●इस मिट्टी की उर्वरता शक्ति कम होती है। इसमें पोटाश,फास्फोरस, चुने की कमी होती है।
●इसका विस्तार 2.85 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक है।
●भारत में चाय, कहवा, मसाले, फल की कृषि इस मिट्टी में की जाती है।
●जनजाति लोग झूम खेती इसी मिट्टी में करते हैं।
●इस मिट्टी का विस्तार कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक है यह मिट्टी हिमालय क्षेत्र, उत्तर पूर्वी पहाड़ी, पश्चिमी पूर्वी घाट में पाई जाती है।
●भारतीय मृदा में जिस सूक्ष्म तत्व की सर्वाधिक कमी होती है वह जस्ता है।
●हिमालय की मिट्टियों में ह्यूमस का अभाव रहता है।जबकि हिमालय में सर्वाधिक क्षेत्र वनाच्छादित है।
●चिकनी मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है इसलिए पौधों को सबसे अधिक पानी चिकनी मिट्टी से मिलती है।
●दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण के द्वारा मृदा को नाइट्रोजन से भरपूर कर देती हैं।
●मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले प्रमुख फसलें अल्फाल्फा, ड्राई बींस, गारबेंजो, बींस, मटर, सोयाबीन, उड़द आदि हैं।
●भूमि की उर्वरता को बढ़ाने के लिए उड़द की फसल उगाई जाती है।
मृदा अपरदन एवं सुधार :-
मृदा अपरदन :-
जल तथा वायु के प्रभाव के कारण मिट्टी की ऊपरी परत कटकर बह जाती है इसे मृदा अपरदन कहते हैं।
●मृदा अपरदन मुख्यतः वनस्पति विहीन एवं ढालू क्षेत्रों में अधिक होता है।
●मृदा अपरदन भारत की एक बहुत बड़ी समस्या है।
●मृदा अपरदन मुख्य रूप से जल एवं वायु द्वारा होता है।
●जहां भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में अपरदन का कारक, जल है।
●वही शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में इसका कारक वायु है।
●मृदा अपरदन के लिए मानवी कारक भी उत्तरदायी है।
●शुष्क व पर्वतीय प्रदेशों में मृदा अपरदन की समस्या का मुख्य कारण वनों का कटाव और कृषि के
अवैज्ञानिक तरीके हैं।
●भारत के जिन क्षेत्रों में वनों और वनस्पतियों का विनाश किया जा रहा है वहां मृदा अपरदन की समस्या बहुत ही अधिक है।
● स्थानांतरण कृषि से भी वनों का नाश होता है और मिट्टी कट जाती है।
मृदा अपरदन के प्रकार :-
मृदा अपरदन के निम्नलिखित प्रकार हैं :-
●आस्फाल अपरदन :-
जब जल पत्तियों से नीचे गिरता है।
●परत अपरदन :-
जब मिट्टी जल के साथ बहने लग जाती है।
●रिल अपरदन :- जब मिट्टी में छोटी एवं कम गहरी नालियां बन जाती हैं।
●अवनालिका अपरदन :- जब रील अपरदन की नालियां बड़ी एवं विस्तृत हो जाती हैं।
●धारा चैनल अपरदन :-
धाराएं एवं नदिया एक किनारे को काटकर दूसरे किनारे पर गाद भार को निक्षेपित करके अपने प्रवाह मार्ग बदलती रहती हैं तीव्र बाढ़ के दौरान क्षति और भी तीव्र हो जाती है।
●समुंद्र तटीय अपरदन :-
इस प्रकार का अपरदन शक्तिशाली तरंगों की तीव्र क्रिया का परिणाम होता है।
●सर्पण अपरदन :-
सर्पण अपरदन भूस्खलन के द्वारा पैदा होता है।
भारत मे मृदा अपरदन के क्षेत्र :-
1.उत्तरी पूर्वी क्षेत्र(चम्बल एवं यमुना नदियों का क्षेत्र) (बिहार,असम,प.बंगाल आदि):-
मृदा अपरदन का मुख्य कारण तीव्र वर्षा तथा बाढ़ और व्यापक स्तर पर नदी के किनारों का कटाव है।
2.हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रेणियां (पश्चिमी हिमालय का गिरीपदीय क्षेत्र) :-
वनस्पतियों का विनाश और गाद जमा होने से नदियों में बाढ़ आ जाना ।
3.छोटा नागपुर पठार
4.(मालवा पठार,आदि ) ताप्ती से साबरमती घाटी तक का क्षेत्र :-
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात के कृषि योग्य भूमि का बीहड़ों में तब्दील होना ।
5.महाराष्ट्र का काली मिट्टी का क्षेत्र( दक्षिण भारत के पर्वत नीलगिरी आदि का क्षेत्र) :-
दक्षिण पहाड़ी क्षेत्र में गहन मृदा अपरदन, नुकीले पर्वत ढाल ,तीव्र वर्षा, कृषि का अनुचित ढग़ से प्रयोग हो सकता है।
6.हरियाणा, राजस्थान, गुजरात के शुष्क क्षेत्र :-
पंजाब व राजस्थान के कुछ भागों जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, भरतपुर में वायु द्वारा मृदा अपरदन होता है।
●विश्व वन्यजीव कोष के एक विश्लेषण के अनुसार सोर्घम किसी अन्य फसल की तुलना में भूमि अपरदन के लिए अधिक उत्तरदाई है।
● फसल चक्र अर्थात फसलों में परिवर्तन के द्वारा मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि की जा सकती है तथा साथ ही यह विधि कीट नियंत्रण में भी मदद करती है।
●मृदा संरक्षण के संबंध में प्रचलित पद्धतियों में
सस्यावर्तन(फसलो का हेरा फेर), वेदिका निर्माण(टैरेसिंग) और वायुरोध को भारत में उपयुक्त माना जाता है।
●मृदा अपरदन के लिए उत्तरदाई कारक नहीं है :-
1.वेदिका कृषि
2.उष्णकटिबंधीय जलवायु
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